डा. उरुक्रम शर्मा
Jaipur News. राजधानी जयपुर को आखिर कब तक अपने हाल पर जीने के लिए छोड़ा जाएगा। व्लर्ड हैरिटेज सिटी के रूप में जाना जाने वाला जयपुर अपने होने पर रो रहा है। हालत यह है कि शहर को संभालने वाला कोई नजर नहीं आता है। शहर कहें तो बिल्कुल अनाथ हो गया है। जयपुर के दोनों निगमों को मिलाकर एक जरूर कर दिया गया, लेकिन इससे कैसे हालत सुधरेंगे और मौजूदा हालत में कैसे सुधार होगा, इसका किसी के पास प्लान मौजूद नहीं है। शहर में आबादी के विस्तार तेजी से हो रहा है। वाहनों की संख्या 35 लाख को पार कर चुकी है। सड़कें कहने को तो चौड़ी हैं, लेकिन पूरी तरह अतिक्रमण की भेंट चढ़ी हुई है। चारदीवारी में पर्यटकों का मेला लगा रहता है, वाहन रेंग कर चलते है। दुकानों के बाहर कारें खड़ी हो जाती है। इनके आगे थड़ी ठेले वालों की कतार लगी रहती है। इसके बाद ई रिक्शा का तांडव रहता है। एक के पीछे ही एक कार चल जाए तो किस्मत है। सरकार हल्ले तो बहुत करती है जयपुर के लिए, लेकिन कोई ठोस प्लान जमीन पर उतरता नहीं है। शहर में हजारों की तादाद में ई रिक्शा ने सारा ट्रैफिक सिस्टम मिट्टी में मिला दिया है, इन्हें रोकने टोकने वाला तक कोई नहीं है। ट्रैफिक पुलिस ने जयपुर में इलाके वाइज ई रिक्शा संचालन की प्लानिंग बनाई, मगर वो कागजों से बाहर निकल ही नहीं पा रही है। अस्थायी अतिक्रमण हटाना प्रशासन के बूते से बाहर हो चुका है। चारदीवारी में निर्माण पर रोक है, मगर अवैध रूप से शहर और शहर के बाहरी इलाके में बड़ी बड़ी इमारतें बन रही है, उन्हें रोका तक नहीं जा रहा है।
जयपुर के दोनों निगमों का कायर्काल खत्म हो चुका है। प्रशासक जयपुर के संभाल रहे हैं। जयपुर में 2013 बैच के आईएएस गौरव को इसका जिम्मा सौंप रखा है, वो ना तो कार से उतरते हैं ना ही एसी दफ्तर से बाहर निकलने की सोचते हैं। समूचा जयपुर सड़ रहा है, सफाई दुरुस्त हो, इसकी कोई सोच ही नहीं रहा है। स्ट्रीट लाइटें महीनों से बंद पड़ी है, किसी को कोई मतलब नहीं है। टूटी सड़कों को पूर्व मुख्य सचिव सुधांश पंत ने 15 नवंबर तक ठीक करने के सख्त आदेश जारी किए थे, मगर मुख्य सचिव के आदेशों को भी रद्दी की टोकरी में डाल रखा है। जनता रोती है, रोती रहे। नेताओं को सिर्फ वोटों से मतलब होता है। नगर निगम के चुनाव कब होंगे , अभी तक सरकार खुद असमंजस में है। अप्रैल 2026 पहले चुनाव कराने के अदालत के आदेश हैं, लेकिन सरकार की मंशा इन्हें टालने की लग रही है।
दोनों निगमों को एक करने के बाद सरकार ने ऐलान किया था कि जयपुर में दो कमिश्रर होंगे, जो सारे शहर की व्यवस्था को संभालेंगे, लेकिन अभी तक एक ही कमिश्नर के हवाले जयपुर है, वे पूरी तरह इसे संभालने में फेल है। अतिक्रमण और अवैध निर्माण रोकने लिए निगम के पास एक एडिशनल एसपी, डीवाईएसपी, इंसपेक्टर्स, कांस्टेबल सहित 300 होमगार्डस की फौज है, लाखों रुपए इन्हें वेतन के रूप में दिया जाता है, सुविधा शुल्क ये अपने हिसाब से वसूलते रहते हैं। इतना होने पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण की बाड आई हुई है।