डा. उरुक्रम शर्मासोस
पश्चिम बंगाल में अकल्पनीय हार के बाद तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो बड़े संकट में फंस गई है। एक तरफ उनकी राजनीतिक पारी खत्म होने का संकट है, दूसरी ओर उनकी पार्टी के लोकसभा-राज्यसभा के सांसद, विधायक उनका साथ छोड़ रहे हैं। ऐसे में उनके हाथ से तृणमूल कांग्रेस का बैनर खत्म होता नजर आ रहा है। कल तक इंडी ब्लाक और कांग्रेस को कोसने वाली ममता बनर्जी को अब कांग्रेस से ही आस नजर आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों को मानना है कि संकट के इस समय अब ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ जल्द कांग्रेस ज्वाइन कर सकती है। ममता ने सोचा भी नहीं था, राजनीति में ऐसा दिन भी देखने का मिलेगा। पहले तो सर को लेकर विरोध करती रही. 15 साल तक केन्द्र की सरकार कोसती रही। प्रधानमंत्र नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह से सीधे टक्कर ली। केन्द्र की योजनाओं को राज्य में लागू नहीं करके जनता के साथ अन्याय किया। अवैध रूप से बांग्लादेशियों को संरक्षण दिया। घुसपैठियों को रोकने के लिए बीएसएफ के मांगने पर भी जमीन नहीं दी। सरकार बदलते ही पूरी तरह राजनीति का खेला हो गया। ममता का अपने लोग ही साथ छोड़ने लगे। जीते हुए 80 विधायकों में से करीब 60 ने ममता से नाता तोड़ कर अलग दल के रूप में मान्यता देने के लिए स्पीकर को आवेदन कर दिया। ममता के खास ऋतब्रत बनर्जी को इसके नेता के रूप में मान्यता दे दी। ऐसे में ममता के हाथ से तृणमूल कांग्रेस को जाने से कोई नहीं बचा सकता।
विधायकों के साथ ही ममता के लोकसभा में 28 सांसद है। इनमें से भी 19 ने ममता का साथ छोड़ने का ऐलान करते हुए लोकसभा अध्यक्ष को मान्यता देने के लिए आवेदन कर दिया है। यानि लोकसभा से भी ममता का वर्चस्व समाप्त। एक के बाद एक झटकों से अभी तो ममता उभर भी नहीं पाई थी कि राज्य सभा के तीन सांसदों ने ममता से दूरी बनाने की घोषणा करते हुए इस्तीफा दे दिया। यानि यहां भी खेला हो गया। अब ममता के पास कांग्रेस की सदस्यता लेकर बची खुचे लोगों को कांग्रेस में शामिल करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। यदि वो ज्वाइन भी कर लेती है तो कांग्रेस में उन्हें राहुल गांधी की जी हुजूरी ही करनी पड़ेगी। जो कि ममता के लिए जहर के घूंंट पीने से कम नहीं।